भेषज (वरिष्ठ पत्रकार), धर्मशाला
पुरानी पेंशन योजना (OPS) पर वित्तीय घाटे का ढोल पीटने वाले नीति-निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों के दावों की हवा निकल गई है। ‘पंजाब दस्तक’ के वरिष्ठ पत्रकार भेषज के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत में देश के पूर्व केंद्रीय वित्त सचिव ने दो-टूक शब्दों में इस नैरेटिव को बेनकाब कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि देश की तिजोरी कर्मचारियों को पेंशन देने से नहीं, बल्कि बड़े उद्योगपतियों के हजारों करोड़ के बैंक कर्ज माफ करने से खाली हो रही है। ओपीएस को वित्तीय बोझ बताना एक सोची-समझी भ्रांति है, जबकि असल आर्थिक संकट की जड़ बेहिसाब कॉर्पोरेट कर्ज माफी है।
वरिष्ठ पत्रकार भेषज के तीखे और तार्किक सवालों पर पूर्व वित्त सचिव ने देश के राजकोषीय गणित की असलियत सामने रखी।
सवाल-दर-सवाल: पूर्व वित्त सचिव से वरिष्ठ पत्रकार भेषज की दो-टूक बातचीत
सवाल (भेषज): जब भी ओपीएस बहाली की आवाज उठती है, सरकारें खजाना खाली होने और देश पर भारी वित्तीय संकट आने का डर दिखाने लगती हैं। इस दलील में कितना दम है?
जवाब (पूर्व वित्त सचिव): इस दलील में कोई सच्चाई नहीं है, यह सिर्फ कर्मचारियों का हक दबाने का बहाना है। ओपीएस लागू होने से देश की अर्थव्यवस्था पर कोई नकारात्मक या विध्वंसक असर नहीं पड़ता। असल वित्तीय असंतुलन तब पैदा होता है जब चुनिंदा बड़े पूंजीपतियों के लाखों करोड़ के एनपीए (NPA) और कर्ज चुटकी बजाते ही ‘राइट ऑफ’ कर दिए जाते हैं। खजाने का खून कॉर्पोरेट घरानों की रियायतों से बह रहा है, कर्मचारियों की पेंशन से नहीं।
सवाल (भेषज): बड़े घरानों के अरबों रुपये के कर्ज बट्टे खाते में डालने का सीधा खामियाजा किसे भुगतना पड़ता है?
जवाब (पूर्व वित्त सचिव): जब उद्योगपतियों की तिजोरियां भरने के लिए बैंक कर्ज माफ किए जाते हैं, तो सरकार का राजकोषीय ढांचा लड़खड़ा जाता है। इस घाटे की भरपाई के लिए आम जनता पर टैक्स का बोझ लाद दिया जाता है और स्वास्थ्य, शिक्षा तथा बुनियादी विकास परियोजनाओं के बजट में कटौती होती है। पूंजीपतियों की अय्याशी का हर्जाना देश का आम नागरिक और ईमानदारी से टैक्स भरने वाला मध्यम वर्ग चुकाता है।
सवाल (भेषज): देश भर के करोड़ों कर्मचारी पुरानी पेंशन की बहाली को अपना स्वाभिमान बता रहे हैं। एक पूर्व वित्त सचिव के नजरिए से यह मांग कितनी जायज है?
जवाब (पूर्व वित्त सचिव): सरकारी कर्मचारी देश की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ हैं। जीवन के 30-35 साल देश सेवा में खपाने वाले कर्मी को बुढ़ापे में सामाजिक सुरक्षा देना किसी सरकार का अहसान नहीं, बल्कि उसका संवैधानिक दायित्व है। ओपीएस सिर्फ पेंशन नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था को चलाने वाला ईंधन है। रिटायर्ड कर्मियों को पेंशन मिलने से बाजार में उपभोग क्षमता (कंजम्पशन) बढ़ती है, व्यापार को गति मिलती है और पैसा वापस घूमकर अर्थव्यवस्था में आता है। यह फिजूलखर्ची नहीं, सामाजिक न्याय और ठोस अर्थशास्त्र है।
इंटरव्यू के सबसे बड़े निष्कर्ष:
अर्थव्यवस्था पर असर नगण्य: पेंशन से खजाने पर कोई आफत नहीं आती, यह वित्तीय रूप से पूरी तरह वहनीय है।
कॉर्पोरेट कर्ज माफी असली नासूर: अरबपतियों की कर्ज माफी से राजकोषीय संतुलन पूरी तरह तबाह हुआ।
संवैधानिक अधिकार, खैरात नहीं: पुरानी पेंशन कर्मचारियों का वैध, संवैधानिक और मानवीय अधिकार है।
कर्मचारी यूनियनों में उबाल: कहा—अब बहस खत्म, तुरंत लागू हो OPS
पूर्व वित्त सचिव के इस ऐतिहासिक और बेबाक रुख के बाद देश भर के कर्मचारी संगठनों में भारी उत्साह है। विभिन्न कर्मचारी महासंघों का कहना है कि अब शीर्ष वित्तीय विशेषज्ञों ने भी स्वीकार कर लिया है कि ओपीएस से बजट को कोई खतरा नहीं है। यह लड़ाई पैसे की नहीं, बल्कि देश के लाखों परिवारों के सामाजिक न्याय और स्वाभिमान की है। संगठनों ने चेतावनी दी है कि सरकारें वित्तीय संकट का बहाना बनाना बंद करें और तत्काल प्रभाव से पूरे भारतवर्ष में ओपीएस बहाल करने का नोटिफिकेशन जारी करें।
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