विशेष रिपोर्ट: सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक
न्यूज़ रूम, चंडीगढ़।
पंजाब की राजनीति इस समय अपने सबसे संवेदनशील और निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर सियासी हलचल तेज है और भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में अपनी रणनीति को पूरी तरह से आक्रामक रूप दे दिया है। भाजपा ने तय किया है कि इस बार पंजाब में केवल सहयोगी दल की भूमिका में रहने के बजाय सीधे अपना मुख्यमंत्री बनाया जाए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब में भाजपा की वर्तमान तैयारी ठीक उसी स्तर की दिखाई दे रही है जैसी इसी वर्ष पश्चिम बंगाल के चुनावों में देखने को मिली थी।
पश्चिम बंगाल मॉडल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ज़मीनी भूमिका
पश्चिम बंगाल में जिस तरह भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं ने लगातार ज़मीन पर पसीना बहाया, संपर्क अभियान चलाए और संगठन को बूथ स्तर तक खड़ा किया, ठीक उसी तर्ज पर अब पंजाब में भी ज़मीनी घेराबंदी की जा रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से चुनावी मंचों पर नहीं जाता, परंतु वह सामाजिक समरसता और सनातन मूल्यों के आधार पर समाज को एकजुट करने के वैचारिक अभियान में निरंतर लगा रहता है। भाजपा नेता भी जनता के बीच जाकर यह समझाने में जुटे हैं कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, वहां विकास और कानून-व्यवस्था की क्या स्थिति है और जहां विपक्षी दलों की सरकारें हैं, वहां हालात कितने बदतर हो चुके हैं।
सादगी के दावों से ‘शीशमहल’ और वीआईपी कल्चर तक का सफर
आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर सीधा हमला बोलते हुए विपक्षी खेमा लगातार यह याद दिला रहा है कि कभी लाल बत्ती न लेने, सरकारी सुरक्षा त्यागने और साधारण फ्लैट में रहने की कसमें खाई गई थीं। आज स्थिति यह है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा लाल बत्ती हटाने से पहले तक वही सुविधाएं ली गईं, दो-दो राज्यों की भारी-भरकम सुरक्षा ली जा रही है और दिल्ली में छह हजार स्क्वायर मीटर के कथित ‘शीशमहल’ से लेकर पंजाब तक विलासितापूर्ण जीवनशैली की चर्चाएं जोरों पर हैं। जनता के बीच यह सवाल उठ रहा है कि जो नेता खुद को आम आदमी कहते थे, वे सत्ता में आते ही जनता से किए वादे पूरी तरह भूल गए।
कर्मचारियों में गहराता रोष, डीए का विवाद और अधूरी गारंटियां
पंजाब में सरकारी कर्मचारियों का आंदोलन चरम पर है। महंगाई भत्ते (डीए) को लेकर कोर्ट से जीत हासिल करने के बावजूद सरकार द्वारा ठोस कदम न उठाए जाने और बातचीत के बजाय सोशल मीडिया पर दिए जा रहे बयानों से कर्मचारी वर्ग में भारी रोष है।
महिलाओं को हर महीने ₹1000 देने का बहुचर्चित चुनावी वादा अब तक ज़मीन पर नहीं उतरा है।
किसान, बागवान, कर्मचारी और पेंशनर—सभी वर्ग खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
जनता का मानना है कि मुख्यमंत्री जो बोलते हैं वह करते नहीं, और जो करते हैं वह बोलते नहीं, केवल झूठा श्रेय लेने की होड़ मची हुई है।
पंथक सियासत में तीखा टकराव और 1984 के मुद्दे पर रुख
दिल्ली और पंजाब की पंथक राजनीति में भी घमासान मचा हुआ है। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (डीएसजीपीसी) ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामलों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। कमेटी ने याद दिलाया कि स्व. अरुण जेटली और स्व. सुषमा स्वराज जैसे भाजपा नेता हमेशा सिखों की न्याय की लड़ाई में साथ खड़े रहे। केंद्र की मोदी सरकार द्वारा एसआईटी गठित करने के बाद ही सज्जन कुमार जेल पहुंचे और जगदीश टाइटलर जैसे आरोपियों के बंद केस दोबारा खुले।
इसके साथ ही, दिल्ली के तीन भाजपा सांसदों द्वारा एक विवादित शोक सभा में जाने की घटना पर कड़ा एतराज जताते हुए भाजपा हाईकमान से सख्त संज्ञान लेने की मांग की गई है। वहीं, किसान आंदोलन के समय पर्दे के पीछे की गई कथित सौदेबाजी और श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के 328 पावन स्वरूपों के मामले में पुराने नेताओं के बदलते राजनीतिक बयानों पर भी तीखा हमला बोला गया है।
’चिट्टे’ का खौफनाक जाल और 15 तारीख से भाजपा का बड़ा आंदोलन
पंजाब में नशे की समस्या सबसे गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। आरोप है कि दिल्ली शराब नीति के कथित घोटालों के बाद पंजाब में भी नशा माफिया बेखौफ हो चुका है। ज़मीनी हकीकत यह बताई जा रही है कि गांवों की गलियों में तीर के निशान लगाकर ड्रग्स मिलने की जगहें तक बताई जाने लगी हैं, जबकि पुलिस प्रशासन शीर्ष स्तर से आदेश न होने के कारण बेबस नजर आ रहा है।
चुनाव से पहले तीन महीने में नशा खत्म करने का वादा करने वाली सरकार को घेरने के लिए भाजपा ने 15 तारीख से पूरे राज्य में एक विशाल जन-जागरूकता आंदोलन और पैदल मार्च निकालने का फैसला किया है। इसके तहत सोशल मीडिया पर पुराने चुनावी वादों के वीडियो सार्वजनिक कर सरकार की जवाबदेही तय की जाएगी।
रिमोट कंट्रोल सरकार और विकास कार्यों की अनदेखी
राजनीतिक विश्लेषकों का आरोप है कि पंजाब सरकार की वास्तविक कमान दिल्ली से रिमोट कंट्रोल द्वारा चलाई जा रही है और स्थानीय नेतृत्व को केवल एक मुखौटे के रूप में इस्तेमाल किया गया। पूरे देश में पार्टी के विज्ञापनों पर खजाना खाली करने के कारण राज्य में बुनियादी विकास कार्य ठप पड़े हैं। मुफ्त बिजली या आंशिक योजनाओं की चमक के पीछे स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के बुनियादी ढांचे की अनदेखी की जा रही है।
नया चुनावी समीकरण: बड़े भाई की भूमिका में भाजपा
चुनाव में अब कुछ ही महीनों का समय बचा है। ऐसे में भाजपा ‘बड़े भाई’ की भूमिका में आगे आ रही है। रणनीतिक विश्लेषण के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभाव रखने वाले अकाली दल को देहात की सीटें देने और शहरी क्षेत्रों में भाजपा द्वारा खुद मजबूत कमान संभालने के समीकरणों पर चर्चाएं गर्म हैं।
आपकी क्या राय है?
क्या पंजाब में आम आदमी पार्टी की वादाखिलाफी, कर्मचारियों की नाराजगी और नशे के मुद्दे के बीच भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल की तर्ज पर ज़मीनी पकड़ बनाकर अपना मुख्यमंत्री बनाने में कामयाब होगी? या फिर पंजाब की जनता कोई नया राजनीतिक समीकरण चुनेगी?
अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
विशेष विश्लेषण: सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक
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