अब राज्यभर में फूंकेंगे पुतले; लुधियाना बैठक में 27 अगस्त से भी बड़े महा-एक्शन की तैयारी, हाई कोर्ट के पैरा 127 और 31 अगस्त के हलफनामे पर कानूनी स्थिति साफ, ‘पंजाब दस्तक’ पर इनसाइड स्टोरी
पंजाब दस्तक विशेष रिपोर्ट
ब्यूरो चीफ: सुरेंद्र राणा
चंडीगढ़/जालंधर/लुधियाना: पंजाब की सियासत और प्रशासनिक गलियारों में इस वक्त पंजाब सरकार और राज्य के लाखों कर्मचारियों के बीच खुली जंग छिड़ चुकी है। 27 अगस्त की ऐतिहासिक महा-हड़ताल के दौरान सूबे के तमाम सरकारी दफ्तर, परिवहन सेवाएं, अस्पतालों की ओपीडी, स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय पूरी तरह ठप रहे। सचिवालय के गलियारों से लेकर पंजाब की सड़कों तक कर्मचारियों का ऐसा असीम सैलाब उमड़ा कि प्रशासनिक मशीनरी के हाथ-पांव फूल गए। लेकिन जालंधर में वार्ता के नाम पर हुए ड्रामे, मुख्यमंत्री की बेरुखी, आंदोलनकारियों पर दबाव बनाने के लिए जारी किए गए अनुशासनिक नोटिसों और हाई कोर्ट के फैसलों के बीच कर्मचारी नेताओं ने ‘पंजाब दस्तक’ के साथ विशेष बातचीत में जमीनी और कानूनी हकीकत को बेबाकी से रखा है।
पंजाब भवन की जगह PAP कॉम्प्लेक्स का चयन: वार्ता या दबाव का घेरा? कर्मचारी नेताओं ने साफ कहा कि दशकों से सरकारी वार्ताएं चंडीगढ़ स्थित पंजाब भवन में होती रही हैं। इसे ऐन वक्त पर बदलकर पंजाब आर्म्ड पुलिस (PAP) हेडक्वार्टर, जालंधर में रखना सरकार की पूर्व-नियोजित दबाव की रणनीति थी। सर्किट हाउस और गेस्ट हाउस के विकल्प होने के बावजूद पुलिस छावनी में बैठक तय करने से नेताओं को हिरासत में लेने और मानसिक दबाव बनाने जैसी गंभीर आशंकाएं पैदा हुईं।
सड़कों पर फूटा आक्रोश: जालंधर में तीन बार वाटर कैनन का इस्तेमाल, जिलों में चक्का जाम: यह रोष केवल सचिवालय तक सीमित नहीं रहा। जालंधर में 3,000 के करीब मुलाजिमों के प्रदर्शन पर पुलिस ने तीन बार वाटर कैनन चलाए। तरनतारन, मानसा, संगरूर सहित पंजाब के कोने-कोने में मुलाजिम सड़कों पर उतरे। चंडीगढ़ सचिवालय में भारी बारिश के बावजूद हजारों कर्मचारी बिना किसी औपचारिक बुलावे के खुद-ब-खुद पहुंचे और नीचे गलियारों में डटे रहे।
सचिवालय में पहरा और अटूट एकजुटता: जालंधर में शीर्ष नेतृत्व की संभावित हिरासत की खबरों के बीच सचिवालय का माहौल गरमा गया। साहिल, शमशेर, रंधावा और सुजान खैरा सहित पहली और दूसरी कतार के नेताओं की मौजूदगी में मुलाजिमों ने दो-टूक संदेश दिया कि वे अपने नेतृत्व के साथ हर मोर्चे पर चट्टान की तरह खड़े हैं।
’धमकी भरे’ नोटिसों का डर बेअसर, कानूनी जवाब से हौसले बुलंद: हड़ताल पर गए कर्मचारियों पर कार्रवाई के सरकारी फरमानों पर नेताओं ने कहा कि कर्मचारी अनाधिकृत गैरहाजिर नहीं थे, बल्कि ‘मास लीव’ लेकर लोकतांत्रिक अधिकार के तहत अपने कार्यस्थलों पर शांतिपूर्ण विरोध दर्ज करा रहे थे। कानूनी जवाब तैयार होते ही मुलाजिमों में फैला भ्रम दूर हो गया और डर पूरी तरह काफूर हो गया।
वार्ता के नाम पर औपचारिकता और गेम प्लान का आरोप: कर्मचारी नेतृत्व का आरोप है कि सरकार पहले से ही मन बना चुकी थी कि न बैठक करनी है और न ही कुछ देना है। यदि सरकार की नीयत साफ होती, तो मुख्यमंत्री वार्ता में आकर फौरी राहतों का ऐलान करते और हड़ताल खत्म करवाकर आगे की बातचीत का रास्ता खोलते। लेकिन आंदोलनकारी नेतृत्व को बाहर खड़ा रखकर अपमानित किया गया।
पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के बयान का हवाला: कर्मचारी नेताओं ने याद दिलाया कि सचिवालय और पंजाब का कर्मचारी सिर्फ जुबानी आश्वासनों पर भरोसा नहीं करता। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी भी यह मानते थे कि जब तक सरकार आधिकारिक तौर पर लिखित (रिटर्न) आदेश नहीं देती, तब तक कोई फैसला मान्य नहीं होता।
अदालती फैसलों और सीधे लागू होने वाली मांगों पर टालमटोल क्यों? नेताओं ने तीखे तेवर में पूछा कि 18-11-2022 की पुरानी पेंशन बहाली (OPS) की अधिसूचना और एसओपी लागू करने के लिए किस नई बैठक की जरूरत है? इसी तरह डीए (DA) और बकाए (एरियर) पर हाई कोर्ट का स्पष्ट फैसला है। 17-7-2015, 15-11-2015 के नियम और कच्चे कर्मचारियों को पक्का करने जैसे नीतिगत फैसलों पर सरकार को सीधे अमल करना चाहिए, न कि बैठकों की आड़ में वक्त जाया करना चाहिए।
’मुफ्त की रेवड़ियों’ और वित्तीय बदहाली पर तीखा प्रहार: कर्मचारी नेताओं ने दो-टूक कहा कि सरकार जो मुफ्त योजनाएं चला रही है, वह किसी पार्टी फंड से नहीं बल्कि मुलाजिमों के रोके गए बकायों और देनदारियों से चल रही हैं। यदि सरकार को मुफ्त बांटना है तो अपने पार्टी फंड और मंत्रियों-विधायकों के वेतन से बांटे, पंजाब की संपत्तियां बेचकर और कर्मचारियों के हक मारकर नहीं। पिछली सरकार द्वारा बजट में रखे गए 12 से 14 हजार करोड़ रुपये कहां गए, इसका हिसाब सरकार को देना होगा।
लुधियाना बैठक में 7 और 27 से भी बड़े महा-आंदोलन का बिगुल: नेताओं ने स्पष्ट किया कि फिलहाल हड़ताल तय समय के अनुसार खत्म और आगे के कार्यक्रम पोस्टपोन हैं। सरकार के पास बिना शर्त सार्थक संवाद का अब भी मौका है। यदि सरकार नहीं मानी, तो रविवार को लुधियाना में सभी जत्थेबंदियों की साझा बैठक होगी, जिसमें 7 और 27 अगस्त से भी कई गुना अधिक प्रचंड आंदोलन का साझा फैसला होगा। इसके साथ ही पूरे पंजाब और सचिवालय में सरकार के पुतले फूंकने का सिलसिला शुरू कर दिया गया है।
’पंजाब दस्तक’ के ब्यूरो चीफ सुरेंद्र राणा के तीखे सवाल और कर्मचारी नेताओं के दो-टूक जवाब
सवाल 1 (सुरेंद्र राणा): जब 7 अगस्त को ही हजारों कर्मचारियों के सम्मेलन में 27 अगस्त की महा-हड़ताल का खुला ऐलान हो चुका था और गृह विभाग, खुफिया एजेंसियों के जरिए मुख्यमंत्री भगवंत मान, वित्त मंत्री हरपाल चीमा, कैबिनेट मंत्री अमन अरोड़ा और मुख्य सचिव को 20 दिन पहले से इसकी जानकारी थी, तो ऐन वक्त पर यह टकराव क्यों बना? मुख्यमंत्री ने खुद समय दिया, तो जालंधर में एक घंटे के भीतर ऐसा क्या हुआ कि वार्ता के बजाय सीधे ट्वीट कर दिया गया? क्या नौकरशाही ने कोई खेल किया या मंत्रियों की सलाह पर फैसला बदला?
जवाब (कर्मचारी नेतृत्व): खुफिया विभाग (IB) ने सरकार को महज 3,000 मुलाजिमों के जुटने की गलत रिपोर्ट दी थी। लेकिन जब चंडीगढ़ और पूरे पंजाब में ढाई लाख से ज्यादा कर्मचारियों का हुजूम सड़कों पर उतर आया और पूरा पंजाब जाम हो गया, तो सरकार बुरी तरह घबरा गई और उसी घबराहट में जालंधर में बैठक तय की गई। वहां पहुंचे प्रतिनिधिमंडल को मुख्यमंत्री से मिलवाने के बजाय अफसरों के पैनल और डीआईजी स्तर के अधिकारियों के जरिए ‘फर्स्ट लेयर, सेकंड लेयर’ की बात कहकर टरकाया गया और अपमानित किया गया।
सवाल 2 (सुरेंद्र राणा): पंजाब के लाखों मुलाजिम और पेंशनर हाई कोर्ट की तरफ बड़ी उम्मीद से देख रहे हैं। सरकार सुप्रीम कोर्ट नहीं गई और न ही हाई कोर्ट का आदेश पूरी तरह लागू किया। अवमानना याचिका (COCP) की तारीख 27 अक्टूबर 2026 तय होने से कर्मचारियों में जो मायूसी है, उसके बीच 31 अगस्त को मुख्य सचिव द्वारा दिए जाने वाले हलफनामे (Affidavit) से क्या उम्मीद बनती है?
जवाब (कर्मचारी नेतृत्व): कानूनी स्थिति पूरी तरह साफ है:
जजमेंट का पैरा 127 और 15 दिन की समयसीमा: फैसले के पैरा 127 के अनुसार 15 दिनों के भीतर मुलाजिमों के तमाम बनते डीए और बकाए (एरियर) का भुगतान करना अनिवार्य है। देरी होने पर सरकार को 6 प्रतिशत की दर से ब्याज देना पड़ेगा।
31 अगस्त का कंप्लायंस हलफनामा अनिवार्य: कोर्ट के फैसले के 15 दिन पूरे होने के बाद 19 से 31 तारीख तक का ब्याज सरकार को देना ही होगा। मुख्य सचिव महोदय को 31 तारीख तक अदालत में कंप्लायंस हलफनामा दाखिल करना ही पड़ेगा, वरना कोर्ट सख्त कार्रवाई करेगी।
एलपीए (LPA) बनाम कंटेंप्ट (COCP): कंटेंप्ट की तारीख आगे जाने से मुख्य फैसले पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मुख्य फैसला माननीय चीफ जस्टिस और डबल बेंच की एलपीए अदालत का है, जो सर्वोच्च और अंतिम है। कंटेंप्ट केवल आदेश पालन की निगरानी है। इसलिए कर्मचारियों को ब्याज समेत पूरा हक मिलना कानूनी रूप से तय है।
कर्मचारी व पेंशनर साथियों के साथ मिलकर जैसे पिछला कानूनी मोर्चा मजबूती से जीता गया, वैसे ही अगला हर जमीनी और अदालती संघर्ष पूरी ताकत से लड़ा जाएगा।
’पंजाब दस्तक’ की विशेष अपील:
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