सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक
शिमला / विशेष रिपोर्ट:
हिमाचल प्रदेश में गहराते पर्यावरण संकट और जलवायु परिवर्तन को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और गंभीर रिपोर्ट सामने आई है। प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्र इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित IIT रोपड़ और विदेशी शोधकर्ताओं के एक संयुक्त वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी है। 1970 में जहां राज्य में केवल 90 ग्लेशियल झीलें थीं, 2024 तक इनकी संख्या 525 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 669 हो चुकी है। इनमें से 88 झीलें अत्यंत संवेदनशील श्रेणी में हैं, जो किसी भी समय ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) बनकर नेपाल जैसी भीषण तबाही का कारण बन सकती हैं।
चार जिलों पर मंडरा रहा सबसे बड़ा खतरा
वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, यह चेतावनी विशेष रूप से चार प्रमुख पर्वतीय जिलों के लिए बेहद गंभीर है:
कुल्लू
लाहौल-स्पीति
मंडी
किन्नौर
इन जिलों में नदियों और नालों के जलग्रहण क्षेत्रों में तेजी से नई झीलों का निर्माण हो रहा है, जिससे बाढ़ और भूस्खलन का जोखिम कई गुना बढ़ गया है।
189 हाइड्रो प्रोजेक्ट्स और अंधाधुंध निर्माण पर सवाल
रिपोर्ट में इस बात पर गंभीर चिंता जताई गई है कि पूरे हिमाचल में इस समय लगभग 189 हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स कार्यरत या निर्माणाधीन हैं। बिना ठोस वैज्ञानिक अध्ययन के हो रहे हाईवे निर्माण, पहाड़ों की अनियोजित कटाई और ग्लोबल वार्मिंग ने पर्यावरण के संतुलन को बिगाड़ दिया है। वर्ष 2023 की भयावह मानसूनी आपदा झेल चुका हिमाचल यदि अब भी सतर्क नहीं हुआ, तो आने वाले समय में परिणाम और भी घातक हो सकते हैं।
विधानसभा सत्र में तुरंत चर्चा की मांग
चूंकि पर्यावरण विभाग का प्रभार स्वयं प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री के पास है, इसलिए यह मामला सीधे नीतिगत फैसलों से जुड़ा है। सोमवार से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर इस ज्वलंत मुद्दे पर विस्तृत चर्चा करनी चाहिए और ठोस कदम उठाने चाहिए।
जनता से अपील:
यह रिपोर्ट हिमाचल के अस्तित्व और सुरक्षा से जुड़ा बेहद संवेदनशील मुद्दा है। इस जानकारी को अधिक से अधिक साझा करें ताकि यह सरकार, प्रशासन और आम जनता तक पहुंचे।
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