ब्यूरो चीफ: सुरेंद्र राणा
चंडीगढ़ (पंजाब दस्तक)
देशभर के लाखों सरकारी कर्मचारियों ने पुरानी पेंशन योजना (OPS) की बहाली को लेकर एक बार फिर आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। 58 से 60 वर्ष की उम्र तक अपनी पूरी जवानी और 30 से 35 साल का सेवाकाल राष्ट्र निर्माण में लगाने वाले कर्मचारियों का कहना है कि बुढ़ापे का एकमात्र सुरक्षित सहारा सिर्फ और सिर्फ ओपीएस ही है। कर्मचारियों ने साफ तौर पर कहा है कि एनपीएस (NPS) और हाल ही में प्रस्तावित यूपीएस (UPS) जैसी व्यवस्थाएं उनके सुरक्षित भविष्य की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं।
कर्मचारी संगठनों ने ‘एक देश, एक पेंशन व्यवस्था’ का मुद्दा उठाते हुए नीति-निर्माताओं से सीधा सवाल पूछा है कि जब 5 साल या महज 1 दिन के लिए चुने जाने वाले सांसदों और विधायकों (MP/MLA) को जीवनभर पुरानी पेंशन का लाभ मिल सकता है, तो जिंदगीभर निष्ठा से काम करने वाले कर्मचारियों को अनिश्चितता के हवाले क्यों किया जा रहा है? जिस तरह हिमाचल प्रदेश सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए अपने कर्मचारियों के लिए ओपीएस बहाल की, उसी तर्ज पर केंद्र और सभी राज्य सरकारों को भी इसे पूरे देश में तुरंत लागू करना चाहिए।
कर्मचारियों के प्रमुख सवाल और मांगें:
बुढ़ापे की सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा: उम्र के अंतिम पड़ाव में जब शारीरिक सामर्थ्य घट जाता है और इलाज के खर्च बढ़ जाते हैं, तब केवल निश्चित पेंशन ही सम्मानजनक जीवन दे सकती है।
NPS और UPS से असंतोष: बाजार के उतार-चढ़ाव पर टिकी योजनाएं कर्मचारियों के सुरक्षित भविष्य की गारंटी नहीं बन सकतीं।
दोहरे मापदंड का विरोध: जब जनप्रतिनिधियों के लिए ओपीएस लागू है, तो कर्मचारियों के लिए अलग नियम क्यों?
हिमाचल मॉडल का क्रियान्वयन: हिमाचल प्रदेश की तरह पूरे देश के कर्मचारियों के लिए बिना शर्त पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल की जाए।
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क्या बुढ़ापे की सुरक्षा के लिए पूरे देश में ओपीएस (OPS) तुरंत बहाल होनी चाहिए?
क्या एनपीएस (NPS) और यूपीएस (UPS) कर्मचारियों के सुरक्षित भविष्य की गारंटी देने में विफल रहे हैं?
क्या ‘एक देश, एक पेंशन’ के तहत सांसदों और विधायकों पर भी वही नियम लागू होने चाहिए जो आम कर्मचारियों पर हैं?
क्या सभी सरकारों को हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर कर्मचारियों को ओपीएस का अधिकार देना चाहिए?
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