पंजाब दस्तक
सुरेंद्र राणा (ब्यूरो चीफ)
किसके राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव में दबी रही जांच? छोटे पुलिसकर्मियों पर तुरंत गाज़, पर CID के बड़े साहबों पर मेहरबानी क्यों? ‘पंजाब दस्तक’ की तीखी एक्सक्लूसिव रिपोर्ट!
शिमला: हिमाचल प्रदेश में एक तरफ ‘व्यवस्था परिवर्तन’ का ढोल पीटा जा रहा है, तो दूसरी तरफ प्रदेश के इतिहास के सबसे बड़े शैक्षणिक जालसाजी मामलों में से एक—‘मानव भारती यूनिवर्सिटी फर्जी डिग्री प्रकरण’—ने पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली और निष्पक्षता पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
वर्ष 2017 में जब हिमाचल प्रदेश निजी शिक्षण संस्थान नियामक आयोग (Regulatory Commission) द्वारा फर्जी डिग्रियों के संबंध में एक अत्यंत गंभीर शिकायत पुलिस विभाग को भेजी गई थी, तो मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए तत्कालीन पुलिस महानिदेशक ने इसकी जांच अपराध अन्वेषण विभाग (CID) को सौंपी थी।
इसके बावजूद, लगभग दो वर्षों तक न तो कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई और न ही कोई प्रभावी आपराधिक जांच प्रारंभ की गई। यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है कि जब शिकायत पूरी तरह स्पष्ट थी और मामला अत्यंत गंभीर था, तो किसके कहने पर यह शिकायत रुकी हुई है? क्यों रुकी हुई है? तब इसे दो वर्षों तक क्यों दबाकर रखा गया?
विलंब के कारण बढ़ा दायरा, सैकड़ों युवाओं का भविष्य पड़ा संकट में
इस दो साल के अभूतपूर्व विलंब के कारण फर्जी डिग्रियों का दायरा लगातार बढ़ता रहा और अनेक विद्यार्थियों का भविष्य संकट में पड़ गया। यदि समय पर कानूनी कार्रवाई की जाती, तो अनेक निर्दोष युवाओं को इस धोखाधड़ी का शिकार होने से बचाया जा सकता था।
जब यह मामला तत्कालीन पुलिस महानिदेशक श्री एस.आर. मरडी के संज्ञान में आया, तब उन्होंने इस असामान्य विलंब के संबंध में जांच के आदेश दिए थे। किंतु आज तक यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इस गंभीर लापरवाही के लिए कौन उत्तरदायी था और किन अधिकारियों की जवाबदेही निर्धारित की गई?
सबसे बड़ा सवाल: वरिष्ठ अधिकारियों को संरक्षण क्यों?
किसी भी आपराधिक मामले में जांच अधिकारी (IO) अकेला उत्तरदायी नहीं होता। प्रत्येक महत्वपूर्ण मामले की निगरानी, समीक्षा और परीक्षण वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा किया जाता है। यदि लगभग दो वर्षों तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई और जांच आगे नहीं बढ़ी, तो यह केवल अधीनस्थ स्तर की विफलता नहीं हो सकती; यह पर्यवेक्षण (Supervision) और शीर्ष नेतृत्व की भी गंभीर विफलता का विषय है।
यदि छोटे-छोटे मामलों में अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध तत्काल विभागीय कार्रवाई की जाती है, तो फिर इस राज्यव्यापी महत्व के मामले में वरिष्ठ सीआईडी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की गई?
’पंजाब दस्तक’ के माध्यम से हिमाचल प्रदेश पुलिस से सीधे प्रश्न:
2017 से 2020 के बीच इस मामले की निगरानी करने वाले वरिष्ठ सीआईडी अधिकारी कौन थे?
दो वर्षों तक एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई? इस असाधारण विलंब के लिए किस अधिकारी को उत्तरदायी ठहराया गया?
क्या किसी वरिष्ठ अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की गई? यदि नहीं, तो क्यों नहीं की गई?
क्या जांच में हुई देरी ने फर्जी डिग्रियों के प्रसार और निर्दोष व्यक्तियों के भविष्य को प्रभावित नहीं किया?
जनता आज ‘पंजाब दस्तक’ के ज़रिए पुलिस विभाग से जवाब चाहती है।
प्रशासनिक उत्तरदायित्व (Accountability) की सबसे बड़ी परीक्षा
पुलिस विभाग में भी जवाबदेही (Accountability) केवल अधीनस्थ अधिकारियों तक सीमित नहीं हो सकती। यदि वरिष्ठ स्तर पर हुई गंभीर चूक के बावजूद किसी की जिम्मेदारी तय नहीं होती, तो यह प्रशासनिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
मानव भारती फर्जी डिग्री प्रकरण केवल एक आपराधिक मामला नहीं है, यह पुलिस प्रशासन की पारदर्शिता, निष्पक्षता और उत्तरदायित्व की भी परीक्षा है। हिमाचल प्रदेश पुलिस को चाहिए कि इस पूरे प्रकरण पर एक विस्तृत सार्वजनिक प्रेस विज्ञप्ति जारी करे तथा स्पष्ट करे कि दो वर्षों तक जांच लंबित रखने के लिए जिम्मेदार वरिष्ठ सीआईडी अधिकारियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई—और यदि कोई कार्रवाई नहीं की गई, तो इसके कारण क्या हैं?
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