विधि संवाददाता, शिमला
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने नगर निगम शिमला के महापौर (मेयर) का कार्यकाल ढाई साल से बढ़ाकर 5 वर्ष किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। प्रदेश सरकार द्वारा इस संवेदनशील मामले में समय पर जवाब दाखिल न करने से नाराज कोर्ट ने सरकार पर 1000 रुपये का हर्जाना (जुर्माना) ठोका है। इसके साथ ही अदालत ने जवाब देने के लिए तीन सप्ताह की अंतिम मोहलत दी है।
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने नगर निगम पार्षदों की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह सख्त आदेश जारी किया। इस मामले की अगली सुनवाई अब 6 अगस्त को तय की गई है।
क्या है पूरा विवाद?
अध्यादेश से हुई थी शुरुआत: प्रदेश सरकार ने 14 नवंबर 2025 को समाप्त हो रहे मेयर के कार्यकाल को आगे बढ़ाने के लिए एक अध्यादेश जारी किया था, जिसे पार्षदों द्वारा हाई कोर्ट में चुनौती दी गई।
राज्यपाल की आपत्ति और दोबारा बिल पास: विधानसभा में 4 दिसंबर 2025 को इससे जुड़ा बिल पारित कर राज्यपाल के पास भेजा गया था। हालांकि, राज्यपाल ने जनवरी 2026 में कुछ आपत्तियों के साथ इसे सरकार को वापस लौटा दिया। इसके बाद सरकार ने 16 फरवरी को इसे दोबारा विधानसभा से पास कराकर राज्यपाल से मंजूरी ली थी।
पार्षदों की कानूनी लड़ाई: मामले में याचिकाकर्ता पार्षदों ने पहले तकनीकी कारणों से याचिका वापस लेकर नए सिरे से इसे दायर करने की अनुमति मांगी थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था। अब इस नए मामले में सरकार के ढुलमुल रवैये पर कोर्ट ने कड़ा संज्ञान लिया है।

