बड़ा भंगाल दौरे के दौरान सीएम सुक्खू के चोला-डोरा पहनने पर विधायक डॉ. जनक राज की प्रतिक्रिया

बड़ा भंगाल में सीएम सुक्खू के ‘चोला-डोरा’ पहनने पर विधायक डॉ. जनक राज ने उठाए सवाल; कहा- ‘परंपरा का सम्मान पूर्ण रूप से हो’

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पंजाब दस्तक
भेषज, भरमौर
​चंबा/भरमौर:

हिमाचल प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू बीते दिनों प्रदेश के सबसे दूरदराज क्षेत्र बड़ा भंगाल के प्रवास पर थे, जहां उन्होंने रात्रि ठहराव भी किया। इस दौरे के दौरान मुख्यमंत्री वहां के गद्दी समुदाय की पारंपरिक वेशभूषा ‘चोला-डोरा’ पहने हुए नजर आए। स्थानीय संस्कृति को सम्मान देने के इस प्रयास के बीच, मुख्यमंत्री द्वारा पारंपरिक चोले के नीचे पैंट पहनने पर भरमौर के विधायक डॉ. जनक राज ने एक रचनात्मक और वैचारिक दृष्टिकोण साझा किया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखकर संस्कृति के पारंपरिक स्वरूप को पूरी तरह अपनाने का आग्रह किया है।


​संस्कृति का सम्मान तभी पूर्ण, जब उसकी परंपरा का आदर हो
उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “किसी भी संस्कृति का सम्मान तभी पूर्ण माना जाता है, जब उसकी आत्मा और उसकी परंपरा, दोनों का समान रूप से आदर किया जाए। माननीय मुख्यमंत्री जी, आपने गद्दी समुदाय की पारंपरिक ‘चोला-डोरा’ वेशभूषा धारण कर हमारी समृद्ध संस्कृति और परंपरा को सम्मान देने का प्रयास किया, इसके लिए आपका आभार और स्वागत है। किसी भी जन प्रतिनिधि द्वारा स्थानीय संस्कृति का सम्मान करना निश्चित रूप से समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है।”


​पैंट की जगह पारंपरिक पजामा होता तो अधिक पूर्ण लगती वेशभूषा
मुख्यमंत्री के समक्ष अपनी बात रखते हुए उन्होंने आगे कहा, “गद्दी पारंपरिक वेशभूषा केवल ‘चोला-डोरा’ तक ही सीमित नहीं है। इसकी अपनी एक पूर्ण संरचना और सांस्कृतिक गरिमा है, जिसमें पारंपरिक टाइट पजामा भी इसका एक अभिन्न अंग है। यदि पैंट के स्थान पर पारंपरिक पजामा धारण किया जाता, तो यह वेशभूषा अधिक पूर्ण और अपनी सांस्कृतिक मौलिकता के अनुरूप प्रतीत होती।”


​पहनावा नहीं, पूर्वजों की विरासत है हमारी संस्कृति
विधायक ने इस बात पर जोर दिया कि हमारी लोक वेशभूषा केवल एक साधारण पहनावा नहीं है, बल्कि यह हमारी पहचान, हमारा इतिहास और पूर्वजों की अनमोल विरासत का जीवंत प्रतीक है। इसलिए जब भी इसे किसी सार्वजनिक मंच पर धारण किया जाए, तो इसकी मौलिकता और इसके पारंपरिक स्वरूप का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि यदि ऐसा अनजाने में हुआ है, तो भविष्य में इस विषय पर और अधिक सावधानी बरती जाएगी। इससे न केवल गद्दी संस्कृति का मान-सम्मान और बढ़ेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक भी हमारी सांस्कृतिक विरासत का बिल्कुल सही स्वरूप पहुंचेगा।


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