हिमाचल विधानसभा में तीन संशोधन विधेयक 2026 पारित

हिमाचल विधानसभा: तीखी नोकझोंक के बीच 3 बड़े संशोधन विधेयक पारित; स्टैंप ड्यूटी, पंचायती राज नियमों और आचार संहिता पर सरकार-विपक्ष में आर-पार

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​सुरेंद्र राणा, विधानसभा परिसर
​हिमाचल प्रदेश विधानसभा में विधायी कामकाज के दौरान भारी गहमागहमी, तीखी तकरार और गंभीर संवैधानिक बहसों के बीच सदन ने तीन प्रमुख संशोधन विधेयकों को ध्वनिमत से अपनी अंतिम मंजूरी दे दी। सदन में ‘भारतीय स्टैंप (द्वितीय संशोधन) विधेयक’, ‘पंचायती राज (द्वितीय संशोधन) विधेयक’ और ‘सड़क अवसंरचना संरक्षण (संशोधन) विधेयक’ पारित किए गए। पूरी कार्यवाही के दौरान चुनावी आचार संहिता, विधायिका बनाम न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र, महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों और जमीन पर अवैध कब्जे (अतिक्रमण) को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जोरदार रार देखने को मिली।


​1. स्टैंप संशोधन विधेयक पारित: केंद्र की कटौती पर राजस्व मंत्री का पलटवार
​राजस्व मंत्री ने सदन के पटल पर ‘भारतीय स्टैंप (हिमाचल प्रदेश द्वितीय संशोधन) विधेयक, 2026’ (विधेयक संख्या 12) को विचारार्थ और पारित करने के लिए प्रस्तुत किया।
​राजस्व मंत्री ने विपक्ष के सवालों का जवाब देते हुए राज्य की वित्तीय स्थिति और केंद्र की नीतियों को रेखांकित किया:
​वित्तीय हिस्सेदारी में कटौती: केंद्र सरकार द्वारा आरडीजी (RDG), जीएसटी (GST) और इनकम टैक्स शेयर के मद में राज्य का पैसा रोके जाने और कटौती किए जाने से राज्य पर वित्तीय दबाव बढ़ा है।


​सक्षम वर्ग पर दायित्व: जब केंद्र सरकार लगातार पेट्रोल और अन्य दरों में वृद्धि कर रही है, तो राज्य को अपने संसाधन जुटाने का पूरा अधिकार है। यह बढ़ोतरी गरीब वर्ग पर बिल्कुल नहीं डाली गई है, बल्कि समाज के सक्षम वर्ग के दायरे में रखी गई है।
​महिलाओं के हितों की रक्षा: विधेयक में महिलाओं के सम्मान और रियायतों का पूरा प्रावधान रखा गया है।
​सदन ने सरकारी संशोधन के साथ खंड 2 और खंड 1 को ध्वनिमत से स्वीकार करते हुए विधेयक संख्या 12 को संशोधित रूप में पारित कर दिया।


​2. पंचायती राज संशोधन विधेयक: चुनावी आचार संहिता और बहू के अधिकारों पर तकरार
​सदन में सबसे तीखी नोकझोंक ‘हिमाचल प्रदेश पंचायती राज (द्वितीय संशोधन) विधेयक, 2026’ (विधेयक संख्या 11) पर हुई। ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री द्वारा विधेयक पेश किए जाने के बाद भाजपा विधायक रणधीर शर्मा और अन्य विपक्षी सदस्यों ने सरकार की मंशा पर कड़े प्रहार किए।


​विपक्ष के मुख्य आरोप और कानूनी सवाल:
​अदालती आदेश और अध्यादेश की टाइमिंग: विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार पंचायत चुनाव टालना चाहती थी। पहले हाईकोर्ट ने 30 अप्रैल तक और फिर सुप्रीम कोर्ट ने 31 मई तक चुनाव कराने के सख्त निर्देश दिए। चुनाव प्रक्रिया शुरू होने, मतदान की तारीखें तय होने और आचार संहिता लागू होने के बाद 6 मई 2026 को ऑर्डिनेंस लाना चुनावी शुचिता और आचार संहिता का सीधा उल्लंघन है।
​चुनावी प्रक्रिया में न्यायिक मर्यादा: चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद जब अदालतें भी चुनावी प्रक्रिया में दखल नहीं देतीं, तब सरकार द्वारा नियमों को बदलना लोकतांत्रिक मर्यादा के खिलाफ है।


​जाति बनाम ससुराल के अतिक्रमण का विरोधाभास: विपक्ष ने तर्क दिया कि कानूनन जाति जन्म (बाय बर्थ) से तय होती है। यदि किसी आरक्षित वर्ग की महिला सामान्य वर्ग में विवाह करती है, तो उसे ससुराल की जाति या आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। ऐसे में जब ससुराल की जाति का लाभ नहीं मिलता, तो ससुराल या ससुर के पुराने भूमि अतिक्रमण (Encroachment) की सजा बहू पर थोपकर उसे चुनाव से वंचित करना दोहरा मापदंड और महिला विरोधी कदम है।
​बैकडेट से लागू करने का विरोध: चुनाव संपन्न होने और जनप्रतिनिधियों के चुने जाने के बाद इस कानून को पिछली तिथि से प्रभावी मानना असंवैधानिक है।


​सदन में विधायिका बनाम न्यायपालिका पर मंथन:
बहस के दौरान विधायिका और न्यायपालिका के अधिकारों पर भी विस्तृत चर्चा हुई, जिसमें सदन की ओर से स्पष्ट किया गया कि संविधान में दोनों संस्थाओं के अधिकार परिभाषित हैं और चेक एंड बैलेंस की व्यवस्था के तहत कोई भी अंग एक-दूसरे से ऊपर या नीचे नहीं है। वहीं जनजातीय दर्जे को लेकर स्पष्ट किया गया कि यदि कोई गैर-जनजातीय महिला रीति-रिवाजों के तहत जनजातीय परिवार में अपनाई जाती है, तो सुप्रीम कोर्ट के तय नियमों के तहत ही व्यवस्था चलती है।


​मंत्री का पलटवार: ‘प्रॉक्सी उम्मीदवारी पर प्रहार’
ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री ने विपक्ष के तमाम आरोपों को खारिज करते हुए सरकार का पक्ष रखा:
​प्रॉक्सी राजनीति का खात्मा: मंत्री ने स्पष्ट किया कि कई लोग सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करने के बाद खुद अयोग्य होने पर अपनी पत्नी या बहू को चुनाव में उतार देते थे। इस विसंगति को समाप्त करना आवश्यक था।
​कानूनी वारिस की जवाबदेही: विवाह के बाद महिला ससुराल की संपत्ति और परिवार की विधिक वारिस (Legal Heir) बनती है, इसलिए परिवार के अतिक्रमण के दायित्व से उसे अलग नहीं देखा जा सकता।


​एक राज्य, एक कानून: नगर निगम (MC) एक्ट की तर्ज पर पंचायती राज संस्थाओं में भी नियमों की एकरूपता स्थापित की गई है।
​सरकार का विधायी अधिकार: नामांकन से पूर्व अध्यादेश जारी करना पूरी तरह से सरकार के अधिकार क्षेत्र में था।
​सदन ने विस्तृत विचार-विमर्श के बाद खंड 2 व 3 और खंड 1 को पारित कर विधेयक संख्या 11 को ध्वनिमत से मंजूरी दे दी।


​3. सड़क अवसंरचना संरक्षण संशोधन विधेयक भी पास
​सदन की कार्यवाही के अंतिम चरण में लोक निर्माण मंत्री (PWD Minister) ने ‘हिमाचल प्रदेश सड़क अवसंरचना संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2026’ (विधेयक संख्या 16) को सदन में विचारार्थ प्रस्तुत किया।
​सड़क तंत्र और लोक निर्माण से जुड़े बुनियादी ढांचे के संरक्षण के लिए लाए गए इस विधेयक पर किसी सदस्य द्वारा चर्चा की मांग नहीं की गई।

विधानसभा अध्यक्ष ने सीधे खंड-वार विचार प्रक्रिया पूरी कराई:
​सदन ने खंड 2 से 14 तक के सभी प्रावधानों को एकमत से विधेयक का अंग स्वीकार किया।
​खंड 1 और विधायी सूत्र को मंजूरी मिलने के साथ ही विधेयक संख्या 16 को भी सदन ने बिना किसी विरोध के ध्वनिमत से पारित कर दिया।
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