विशेष संपादकीय विश्लेषण — सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक
शिमला: हिमाचल प्रदेश की 14वीं विधानसभा का मौजूदा सत्र जनमुद्दों की चर्चा के लिए नहीं, बल्कि सियासी ड्रामे और नूराकुश्ती के नए कीर्तिमान स्थापित करने के लिए याद रखा जाएगा। सदन के बाहर और भीतर जो कुछ घट रहा है, वह लोकतंत्र के मंदिर की गरिमा को तार-तार करने वाला है। एक तरफ विपक्ष ‘अटैची’ लेकर धरने पर बैठता है और सरकार पर तीखे हमले बोलता है, तो दूसरी तरफ मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और तमाम मंत्री ‘चीनी महंगी’ और ‘चीनी चोर’ के नारों के साथ मोर्चा खोल देते हैं। सवाल सीधा है—क्या जनता ने अपने नुमाइंदों को इसीलिए चुनकर भेजा था कि वे जनता के गाढ़े पसीने की कमाई पर टीए-डीए बटोरें और सदन को सियासी अखाड़ा बना दें?
नारेबाज़ी का खेल, बुनियादी सवाल फेल
सदन का सत्र शुरू होते ही दोनों खेमों की स्क्रिप्ट पहले से तैयार दिखती है। भाजपा कांग्रेस को घेरने के लिए नारे तलाशती है, तो कांग्रेस पलटवार के लिए नए आरोप गढ़ती है। लेकिन इस सियासी तमाशे के बीच वो बुनियादी मुद्दे पूरी तरह गायब हैं, जो आज प्रदेश के हर नागरिक का गला घोंट रहे हैं:
आपदा के जख्म और वैज्ञानिक अनदेखी: मानसून की विनाशकारी बरसात में प्रदेश को करोड़ों का नुकसान हुआ। सड़कें बह गईं, पहाड़ दरक गए और सैकड़ों परिवार बेघर हो गए। नेशनल हाईवे की अवैज्ञानिक कटिंग और ठेकेदारों की मनमानी पर किसी दल के पास ठोस नीति नहीं है।
कर्ज के दलदल में धंसता हिमाचल: प्रदेश पर वित्तीय संकट के बादल गहरे हैं, मगर फिजूलखर्ची और सियासी बयानबाजी पर कोई लगाम नहीं है।
बेरोजगारी का दंश: 5 लाख नौकरियों और हर साल 1 लाख रोजगार के वादे हवा-हवाई साबित हुए हैं। पीरियोडिक लेबर फोर्स (PLFS) के आंकड़े बताते हैं कि सरकारों के बदलने से बेरोजगारों की संख्या (10-12 लाख) का दर्द नहीं बदला। तकनीकी शिक्षा और स्टार्टअप के अभाव में हिमाचल का हुनर पंजाब, हरियाणा और दिल्ली की ओर पलायन को मजबूर है।
जनता की गाढ़ी कमाई और नेताओं का शाही अंदाज
सदन के तीन दिन हंगामे, वॉकआउट और नारेबाजी की भेंट चढ़ चुके हैं। इन माननीय नेताओं की तनख्वाह, भत्ते, टीए और डीए सीधे जनता की जेब से जाते हैं। जिस सदन में प्रदेश के पुनर्निर्माण और नीति-निर्माण पर 24 घंटे मंथन होना चाहिए था, वहां सिर्फ एक-दूसरे की पगड़ियां उछाली जा रही हैं। आम आदमी महंगाई और बेरोजगारी की चक्की में पिसकर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर रहा है, जबकि नेता अपने कार्यकर्ताओं के साथ ‘मेरा नेता जिंदाबाद’ के नारों में मस्त हैं।
हिमाचल की प्रबुद्ध जनता अब यह तमाशा देख रही है। विधानसभा का मतलब सिर्फ राजनीतिक कद बढ़ाना या एक-दूसरे पर कीचड़ उछालना नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं का समाधान निकालना है।
सटीक, निष्पक्ष और बेबाक खबरों के लिए पंजाब दस्तक के फेसबुक पेज और यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करें, फॉलो करें और शेयर करें।
देखते रहें पंजाब दस्तक — आपका अपना चैनल
ब्यूरो चीफ: सुरेंद्र राणा, पंजाब दस्तक

