सुप्रीम कोर्ट का DA फैसला और कर्मचारियों पेंशनरों के अधिकार

​महंगाई भत्ते पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: कर्मचारियों और पेंशनरों को मिलेगा समान हक, सरकारों की मनमानी और भेदभाव पर चला चाबुक

Spread the love

पंजाब दस्तक
​विशेष रिपोर्ट: सुरेंद्र राणा (ब्यूरो चीफ), चंडीगढ़


चंडीगढ़: सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के लाखों सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के हक में एक बेहद ऐतिहासिक, साहसिक और नज़ीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने सख्त लहजे में साफ कर दिया है कि महंगाई भत्ते (DA) की दरों में सेवारत कर्मचारियों और सेवानिवृत्त पेंशनरों के बीच किसी भी तरह का भेदभाव, अंतर या कटौती पूरी तरह से गैर-कानूनी, असंवैधानिक और अमान्य है।


​यह ऐतिहासिक फैसला सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश मनोज मिश्रा और न्यायाधीश प्रसन्ना बी. बराले की पीठ (सिविल अपील 11592-11593) द्वारा सुनाया गया, जो पूरे देश के राज्यों (हरियाणा, पंजाब, हिमाचल, दिल्ली आदि) के कर्मचारियों और पेंशनरों के अधिकारों पर मुहर लगाता है।


​केरला सरकार की याचिकाएं खारिज: सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी
​मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने केरला सरकार और ‘केएसआरटीसी’ (KSRTC) द्वारा दायर अपीलों को सिरे से खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों की नीयत पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा:
​”महंगाई किसी को देखकर नहीं आती। इसका प्रचंड बोझ सेवारत कर्मचारियों और पेंशनभोगियों, दोनों पर एक समान पड़ता है। महंगाई दोनों वर्गों को वित्तीय संकट में धकेलती है। ऐसे में पेंशनरों के लिए डीए की दरें कम तय करना या रोकना पूरी तरह अनुचित है और कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं है।”


​दरअसल, 2021 में केरला सरकार ने कर्मचारियों को 14% और पेंशनरों को महज 11% डीए दिया था। 2022 में हाईकोर्ट ने इस भेदभाव को रद्द किया था, जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट ने भी अंतिम मुहर लगाते हुए सरकार की याचिका को खारिज कर दिया।


​’पंजाब दस्तक’ की एक्सक्लूसिव बातचीत: “संविधान के अनुच्छेद 14 की सीधी जीत”
​इस राष्ट्रीय महत्व के फैसले पर ‘पंजाब दस्तक’ के ब्यूरो चीफ सुरेंद्र राणा ने पंजाब सिविल सचिवालय स्टाफ एसोसिएशन के प्रधान सुशील कुमार फौजी से एक्सक्लूसिव बातचीत की।


​सुशील कुमार फौजी ने बेबाकी से कहा:
​”भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 हर नागरिक को समता और समानता का अधिकार देता है। सरकारें पेंशनरों या कर्मचारियों के बीच फर्क पैदा करके संविधान की धज्जियां उड़ा रही थीं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि डीए कोई खैरात नहीं, बल्कि कर्मचारियों का संवैधानिक अधिकार है।”


​पंजाब में दोहरा मापदंड: अफसरों को 58%, आम कर्मचारियों को 42% डीए!
​देश भर के परिदृश्य के साथ-साथ पंजाब के हालातों पर चिंता जताते हुए सुशील फौजी ने खुलासा किया कि पंजाब हाईकोर्ट में भी इससे मिलता-जुलता मामला (CWP 7264/2026) विचाराधीन है:
​खुला भेदभाव: पंजाब सरकार आईएस (IAS), आईपीएस (IPS) और ज्यूडिशियल अफसरों को 58% डीए दे रही है, जबकि आम कर्मचारियों और पेंशनरों को महज 42% दिया जा रहा है। यह सीधे-सीधे 16% डीए का डाका है।


​’खाली खजाने’ का झूठा बहाना ध्वस्त: अदालत में जब सरकारी पक्ष ने ‘खजाना खाली’ होने का राग अलापा, तो यह साफ हुआ कि अफसरों को डीए देते समय खजाना भरा रहता है और कर्मचारियों के वक्त खाली—यह तर्क पूरी तरह खोखला और हास्यास्पद है।


​कर्मचारियों पर दोहरी मार: क्लास IV और NPS कर्मचारी पिस रहे
​चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी: 16% डीए रोके जाने के कारण एक छोटे कर्मचारी को हर महीने ₹5,000 से ₹7,000 का सीधा वित्तीय नुकसान हो रहा है।
​एनपीएस (NPS) कर्मचारी: पंजाब के 60% एनपीएस कर्मचारियों पर दोहरी मार पड़ रही है। डीए कम होने से सरकार द्वारा उनके खाते में जमा किया जाने वाला 14% शेयर भी कम हो रहा है।


​’सुप्रीम कोर्ट और वेस्ट बंगाल जजमेंट’ का स्पष्ट संदेश: “बिना देरी जारी हो पूरा डीए”
​’पंजाब दस्तक’ से बातचीत में वेस्ट बंगाल केस (SLP 22628/2022) का भी हवाला दिया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चुका है कि “महंगाई भत्ता कर्मचारियों का वैधानिक और कानूनी हक (Right) है, जिसे कोई भी सरकार रोक नहीं सकती।”
​कर्मचारी यूनियनों ने चेतावनी दी है कि पंजाब, हरियाणा, हिमाचल और दिल्ली सहित सभी राज्य सरकारें अब रिव्यू या अपील के बहाने समय बर्बाद न करें और तुरंत 16% बकाया डीए रिलीज करें। यदि सरकारें अड़ियल रवैया अपनाएंगी, तो देश भर के कर्मचारी और पेंशनर सड़कों पर उतरकर मुंहतोड़ जवाब देने को तैयार हैं।


​📌 विशेष सूचना:
यह पूरा एक्सक्लूसिव और धारदार इंटरव्यू आप पंजाब दस्तक के आधिकारिक फेसबुक पेज पर भी देख सकते हैं।
​देश और राज्यों की हर बड़ी खबर को निष्पक्षता से देखने के लिए पंजाब दस्तक को तुरंत लाइक करें, शेयर करें और पेज को फॉलो करना न भूलें!
देखते रहें — ‘पंजाब दस्तक’!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *